जैसे हमारे घर की रसोई में सबसे महँगा और मशहूर ब्रांड का उपकरण रखा हो, लेकिन अगर उसमें बिजली न हो तो वह सिर्फ एक सजावटी डिब्बा बनकर रह जाता है। वह न खाना बनाएगा, न किसी काम आएगा। उसी तरह एक लगभग नई गाड़ी भी, चाहे कितनी ही चमकदार क्यों न हो, बिना पेट्रोल या बैटरी के एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकती। उसकी क्षमता होते हुए भी वह निष्क्रिय रहती है। इसी तरह इंसान के भीतर भी कई अच्छे विचार होते हैं। बच्चे सोचते हैं कि वे बड़ा खिलाड़ी बनेंगे, अच्छा डॉक्टर या इंजीनियर बनेंगे, या कुछ अलग और बड़ा करेंगे। विचार होना बहुत अच्छी बात है, लेकिन सिर्फ सोचने से कुछ नहीं बदलता। जब तक उन विचारों को मेहनत की ऊर्जा नहीं मिलती, वे भी बंद पड़े उपकरण की तरह ही रहते हैं। मेहनत की ऊर्जा सिर्फ पढ़ाई तक सीमित नहीं होती। इसमें समय देना, रोज़ अभ्यास करना, कभी-कभी खेल या आराम छोड़ना, मोबाइल कम चलाना, जल्दी उठना, गलतियों से सीखना और धैर्य रखना भी शामिल है। कई बार दोस्तों के साथ मस्ती छोड़कर पढ़ाई करनी पड़ती है, कई बार आराम के बजाय ज़िम्मेदारी चुननी पड़ती है। यही छोटी-छोटी कुर्बानियाँ असल में ऊर्जा का काम करती हैं। दिन-प्...