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क्या भारत में सरकारी प्राथमिक शिक्षक सबसे ज़्यादा इस्तेमाल और सबसे कम सम्मानित संसाधन बन चुके हैं?

  • क्या भारत में सरकारी प्राथमिक शिक्षकों का सबसे अधिक दुरुपयोग होता है?
  • सरकारी योजनाओं का बोझ प्राथमिक शिक्षकों पर क्यों डाला जाता है?
  • ULLAS और अन्य योजनाओं के टारगेट से प्राथमिक शिक्षक क्यों परेशान हैं?
  • क्या गैर-शैक्षणिक कार्यों से सरकारी स्कूलों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है?
  • प्राथमिक शिक्षक को सबसे कम आंका जाने वाला सरकारी संसाधन क्यों माना जाता है?
भारत में सरकारी प्राथमिक शिक्षकों का सबसे अधिक दुरुपयोग


भारत में एक शिक्षक की ज़िंदगी बाहर से देखने पर बहुत सम्मानजनक लगती है। लोग समझते हैं कि शिक्षक स्कूल में पढ़ाता है, बच्चों को ज्ञान देता है और शाम को घर चला जाता है। लेकिन ज़मीन की सच्चाई कई बार बिल्कुल अलग होती है। पिछले कुछ वर्षों में सरकारी स्कूलों के शिक्षकों पर कई तरह की प्रशासनिक जिम्मेदारियाँ डाली गई हैं। कागज़ों में ये योजनाएँ बहुत अच्छी लगती हैं, लेकिन जब उन्हें जमीन पर लागू किया जाता है तो कई बार उनका बोझ उसी शिक्षक पर आ जाता है जो पहले ही सीमित संसाधनों के बीच बच्चों को पढ़ाने की कोशिश कर रहा होता है।


हाल के वर्षों में सरकार ने वयस्क साक्षरता के लिए “ULLAS” नाम से एक कार्यक्रम शुरू किया है, जिसका उद्देश्य उन लोगों को पढ़ना-लिखना सिखाना है जो 15 वर्ष से अधिक उम्र के हैं और किसी कारण से स्कूल नहीं जा पाए। इस कार्यक्रम का लक्ष्य पूरे देश में करोड़ों निरक्षर लोगों को पढ़ाना है और स्कूलों को ही इस योजना के क्रियान्वयन की इकाई बनाया गया है।


कागज़ों में यह विचार बहुत अच्छा है। समाज में आज भी ऐसे लोग हैं जो पढ़ना-लिखना नहीं जानते और उन्हें बुनियादी शिक्षा मिलनी चाहिए। लेकिन जब इस योजना को गाँव के स्तर पर लागू किया जाता है, तब कई व्यावहारिक समस्याएँ सामने आती हैं, जिनके बारे में शायद योजना बनाने वाले लोगों ने ठीक से सोचा नहीं होता।
एक सामान्य सरकारी प्राथमिक स्कूल के शिक्षक की स्थिति समझने की कोशिश करें। वह पहले से ही कई जिम्मेदारियों से घिरा हुआ होता है। उसे बच्चों को पढ़ाना है, मिड-डे-मील की व्यवस्था देखनी है, सर्वे करने हैं, चुनाव ड्यूटी करनी है, कभी जनगणना का काम, कभी टीकाकरण अभियान, कभी पोषण अभियान। इन सबके बीच उसका असली काम – बच्चों को पढ़ाना – कई बार पीछे छूट जाता है।
अब इसी बीच एक नया लक्ष्य आता है – गाँव से कम से कम 15 वयस्कों को ULLAS कार्यक्रम में जोड़ना। आदेश ऊपर से आता है और ब्लॉक से लेकर स्कूल तक वही संदेश पहुँचता है – “टारगेट पूरा होना चाहिए।”
समस्या तब शुरू होती है जब वास्तविकता उस लक्ष्य से मेल नहीं खाती।


कई गाँव ऐसे हैं जहाँ लगभग सभी युवा लोग पहले से पढ़े-लिखे हैं। नई पीढ़ी तो कम से कम मोबाइल चलाना, बैंक का काम करना और हस्ताक्षर करना जानती है। कुछ बुजुर्ग जरूर होंगे जिन्हें औपचारिक शिक्षा नहीं मिली, लेकिन वे भी अक्सर इस उम्र में पढ़ाई के लिए तैयार नहीं होते। ऐसे में एक शिक्षक के सामने सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है – “मैं 15 निरक्षर वयस्क कहाँ से लाऊँ?”


लेकिन प्रशासन के लिए यह सवाल मायने नहीं रखता। वहाँ सिर्फ आंकड़े मायने रखते हैं।
इसके बाद शुरू होती है वह प्रक्रिया जिसे आम भाषा में “कागज़ पूरा करना” कहा जाता है। शिक्षक गाँव में घूमता है, लोगों से बात करता है, समझाने की कोशिश करता है। कई लोग साफ मना कर देते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि उनके पास समय नहीं है। कोई कहता है कि वह मजदूरी करता है, शाम को थका हुआ होता है। कोई कहता है कि उसे अब पढ़ाई की जरूरत नहीं।
फिर भी लक्ष्य वही रहता है – 15 नाम।


यहीं से मानसिक दबाव शुरू होता है। कई जगहों पर शिक्षक मजबूरी में ऐसे लोगों के नाम जोड़ देते हैं जो वास्तव में निरक्षर नहीं होते। कहीं रिश्तेदारों या परिचितों से आधार कार्ड और पैन कार्ड लेकर पंजीकरण कर दिया जाता है। क्योंकि पोर्टल पर पंजीकरण के लिए पहचान संबंधी जानकारी देना जरूरी होता है। ([DSEL Education][2])
यह स्थिति शिक्षक के लिए बेहद असहज होती है। वह जानता है कि यह वास्तविक शिक्षा नहीं है, सिर्फ आंकड़ा पूरा करना है। लेकिन अगर वह लक्ष्य पूरा नहीं करेगा तो ऊपर से फोन आएंगे, मीटिंग में सवाल होंगे, और उसे ही जिम्मेदार ठहराया जाएगा।


सबसे दुखद पहलू यह है कि इस पूरी प्रक्रिया में वही शिक्षक परेशान होता है जो पहले से ही सीमित संसाधनों में काम कर रहा है। ग्रामीण प्राथमिक स्कूलों की हालत किसी से छिपी नहीं है। कई जगह दो-तीन कक्षाओं को एक ही शिक्षक संभालता है। बच्चों के लिए बुनियादी सुविधाएँ भी पूरी नहीं होतीं। फिर भी वही शिक्षक नई-नई योजनाओं का बोझ उठाता रहता है।


इसका असर बच्चों पर भी पड़ता है। जो समय बच्चों को पढ़ाने में लगना चाहिए, वह कभी सर्वे में चला जाता है, कभी पोर्टल भरने में, कभी किसी योजना की रिपोर्ट बनाने में। धीरे-धीरे शिक्षक के भीतर एक निराशा पैदा होने लगती है। उसे लगता है कि उसकी असली भूमिका को समझा ही नहीं जा रहा।


समाज भी कई बार इस स्थिति को नहीं समझता। बाहर से देखने वाले लोग अक्सर कहते हैं कि “सरकारी शिक्षक काम नहीं करते।” लेकिन बहुत कम लोग यह देखते हैं कि उनसे कितने अलग-अलग काम करवाए जा रहे हैं।
ULLAS जैसी योजना का उद्देश्य निश्चित रूप से अच्छा है। अगर सच में निरक्षर लोगों को पढ़ाया जाए तो समाज को इसका लाभ मिलेगा। लेकिन किसी भी योजना की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसे जमीन पर किस तरह लागू किया जाता है।


अगर हर गाँव की वास्तविक स्थिति का अध्ययन किए बिना सिर्फ संख्या तय कर दी जाए, तो योजना का उद्देश्य खो जाता है। तब वह शिक्षा का अभियान नहीं, बल्कि आंकड़ों का खेल बन जाती है।
एक प्राथमिक शिक्षक की सबसे बड़ी ताकत उसका समय और ऊर्जा होती है। अगर वही समय बार-बार प्रशासनिक लक्ष्यों में खर्च हो जाए, तो अंत में नुकसान उसी बच्चे का होता है जो स्कूल में पढ़ने आता है।
इसलिए शायद जरूरत इस बात की है कि योजनाएँ बनाते समय जमीन की सच्चाई को समझा जाए। हर गाँव की स्थिति अलग होती है। कहीं निरक्षर लोग अधिक होंगे, कहीं बहुत कम। ऐसे में एक ही लक्ष्य सब पर थोप देना व्यावहारिक नहीं होता।


एक शिक्षक चाहता है कि वह बच्चों को अच्छी शिक्षा दे, उन्हें जीवन में आगे बढ़ने का रास्ता दिखाए। लेकिन जब वह दिन भर आंकड़े जुटाने और पोर्टल भरने में लगा रहता है, तो उसके भीतर यह सवाल उठता है कि क्या यही वह काम है जिसके लिए उसने शिक्षक बनने का सपना देखा था।


शिक्षा सिर्फ योजनाओं से नहीं चलती, बल्कि उन लोगों से चलती है जो रोज़ स्कूल के दरवाज़े खोलते हैं और बच्चों को पढ़ाने की कोशिश करते हैं। अगर वही लोग लगातार दबाव और मानसिक तनाव में रहेंगे, तो किसी भी योजना का असली उद्देश्य पूरा नहीं हो पाएगा।

प्राथमिक शिक्षक पूरे शिक्षा तंत्र की नींव है

अगर जमीन की वास्तविकता देखी जाए तो सरकारी व्यवस्था में प्राइमरी शिक्षक शायद सबसे ज़्यादा इस्तेमाल किया जाने वाला और सबसे कम समझा जाने वाला संसाधन बन गया है।

एक प्राथमिक शिक्षक का मूल काम बहुत स्पष्ट है – छोटे बच्चों को पढ़ाना, उन्हें जीवन की बुनियादी समझ देना, और शिक्षा की मजबूत नींव तैयार करना। लेकिन व्यवहार में उससे जो काम लिए जाते हैं, वे अक्सर उसके मूल कार्य से बिल्कुल अलग होते हैं।

गाँव के प्राथमिक शिक्षक को देखिए। वह शिक्षक कम और “सरकारी बहुउद्देश्यीय कर्मचारी” ज़्यादा बन चुका है। कभी चुनाव ड्यूटी, कभी जनगणना, कभी सर्वे, कभी किसी योजना का डेटा इकट्ठा करना, कभी पोषण अभियान, कभी स्वास्थ्य विभाग की मदद, कभी आधार अपडेट कैंप, कभी किसी नई योजना का प्रचार। सूची इतनी लंबी हो जाती है कि असली काम पीछे छूट जाता है।

इसका एक कारण यह भी है कि सरकार के पास गाँव में सबसे विश्वसनीय, पढ़ा-लिखा और उपलब्ध व्यक्ति अक्सर वही शिक्षक होता है। इसलिए जब भी किसी योजना को लागू करना होता है, सबसे आसान विकल्प यही लगता है कि स्कूल को ही उसका केंद्र बना दिया जाए और शिक्षक को जिम्मेदारी दे दी जाए।

कागज़ों में यह व्यवस्था बहुत सुविधाजनक लगती है। लेकिन इसका असर धीरे-धीरे शिक्षक की पेशेवर पहचान पर पड़ता है।

समाज में एक अजीब विरोधाभास दिखाई देता है। एक तरफ हर कोई कहता है कि शिक्षा सबसे महत्वपूर्ण है, और दूसरी तरफ उसी शिक्षा व्यवस्था के सबसे बुनियादी स्तंभ — प्राथमिक शिक्षक — को सबसे कम महत्व दिया जाता है।

कई बार लोग यह समझते हैं कि प्राथमिक शिक्षक का काम आसान है, क्योंकि वह छोटे बच्चों को पढ़ाता है। जबकि वास्तविकता उलटी है। छोटे बच्चों को पढ़ाना सबसे कठिन कामों में से एक है। उसी उम्र में बच्चे पहली बार भाषा, गणित, अनुशासन, सामाजिक व्यवहार और सीखने की आदत विकसित करते हैं। अगर यह नींव कमजोर रह जाए तो आगे की पूरी शिक्षा प्रभावित होती है।

लेकिन जब वही शिक्षक बार-बार गैर-शैक्षणिक कामों में उलझा दिया जाता है, तो उसका ध्यान बिखर जाता है। उसके अंदर धीरे-धीरे यह भावना भी आने लगती है कि उसकी विशेषज्ञता की कोई कद्र नहीं है। उससे कोई भी काम लिया जा सकता है।

इस स्थिति का एक और मनोवैज्ञानिक पहलू भी है। लगातार दबाव और अव्यवहारिक लक्ष्यों के कारण शिक्षक के भीतर निराशा और असहायता पैदा होने लगती है। वह जानता है कि वह जो कर रहा है वह शिक्षा का आदर्श तरीका नहीं है, लेकिन व्यवस्था में रहते हुए वह उससे बच भी नहीं सकता।

यह समस्या केवल किसी एक योजना की नहीं है। यह एक व्यापक प्रशासनिक सोच का परिणाम है, जिसमें प्राथमिक शिक्षक को एक आसान संसाधन की तरह देखा जाता है — ऐसा व्यक्ति जिसे किसी भी सरकारी कार्यक्रम के लिए तुरंत इस्तेमाल किया जा सकता है।

अगर शिक्षा व्यवस्था को सच में मजबूत बनाना है, तो सबसे पहले यह समझना होगा कि प्राथमिक शिक्षक सिर्फ एक कर्मचारी नहीं है, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र की नींव है

जिस तरह एक इमारत की मजबूती उसकी नींव पर निर्भर करती है, उसी तरह समाज की बौद्धिक और नैतिक ताकत प्राथमिक शिक्षा पर निर्भर करती है। और उस प्राथमिक शिक्षा की पूरी जिम्मेदारी उसी शिक्षक के कंधों पर होती है जिसे अक्सर सबसे कम महत्व दिया जाता है।

शायद समय आ गया है कि हम इस दृष्टिकोण को बदलें। शिक्षक को हर समस्या का “आसान समाधान” मानकर हर योजना का बोझ उस पर डालना बंद करना होगा। उसे वही करने दिया जाए जिसके लिए वह प्रशिक्षित है — बच्चों को शिक्षित करना।

क्योंकि अगर प्राथमिक शिक्षक को सम्मान, समय और स्वतंत्रता मिलेगी, तो उसका लाभ सीधे समाज की आने वाली पीढ़ियों को मिलेगा। और इससे बड़ा निवेश किसी भी देश के लिए नहीं हो सकता।

इंटर्नशिप या फेलोशिप मॉडल

अगर शांत दिमाग से देखें तो ULLAS जैसे कार्यक्रमों का उद्देश्य गलत नहीं है। समाज में वयस्क साक्षरता बढ़ाना निश्चित रूप से अच्छी बात है। लेकिन जब किसी योजना को लागू करने के लिए पहले से ही व्यस्त शिक्षक को ही मुख्य संसाधन बना दिया जाता है, तो दो समस्याएँ पैदा हो जाती हैं।

पहली समस्या यह है कि शिक्षक का मुख्य कार्य प्रभावित होता है। प्राथमिक शिक्षक का सबसे बड़ा काम बच्चों की नींव मजबूत करना है। अगर वही समय बार-बार सर्वे, पंजीकरण, पोर्टल अपडेट, रिपोर्ट और टारगेट पूरा करने में चला जाए, तो कक्षा का वास्तविक शिक्षण प्रभावित होना लगभग तय है।

दूसरी समस्या आर्थिक दृष्टि से भी है। यदि एक सरकारी शिक्षक की कुल लागत (वेतन, भत्ते, पेंशन दायित्व आदि मिलाकर) औसतन 2500 से 4000 रुपये प्रतिदिन के बराबर बैठती है, तो उसे ऐसे कामों में लगाना जो किसी प्रशिक्षु या अंशकालिक कार्यकर्ता से भी हो सकते हैं, आर्थिक रूप से भी बहुत कुशल निर्णय नहीं लगता।

भारत में हर साल हजारों छात्र B.Ed., D.El.Ed., BTC या अन्य शिक्षक प्रशिक्षण कोर्स कर रहे होते हैं। उनमें से बहुत से लोग वास्तविक स्कूल वातावरण का अनुभव भी चाहते हैं। अगर सरकार चाहे तो इन प्रशिक्षुओं के लिए एक व्यवस्थित इंटर्नशिप या फेलोशिप मॉडल बनाया जा सकता है।

इसमें कुछ फायदे स्पष्ट दिखाई देते हैं।

पहला, प्रशिक्षु को वास्तविक सामाजिक और शैक्षणिक अनुभव मिलेगा। उसे सिर्फ किताबों से नहीं, बल्कि गाँव और समाज की वास्तविक परिस्थितियों से सीखने का अवसर मिलेगा।

दूसरा, सरकार कम लागत में काम करवा सकती है। अगर प्रशिक्षुओं को प्रतीकात्मक मानदेय दिया जाए तो यह शिक्षक की पूरी लागत के मुकाबले काफी कम होगा।

तीसरा, नियमित शिक्षक का समय बच जाएगा। वह अपने असली काम यानी बच्चों की शिक्षा पर अधिक ध्यान दे सकेगा।

चौथा, समाज के साथ शिक्षा प्रणाली का जुड़ाव भी बढ़ेगा। जब युवा प्रशिक्षु गाँवों में जाकर वयस्क साक्षरता या अन्य सामाजिक कार्यक्रमों में काम करेंगे, तो शिक्षा सिर्फ स्कूल की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहेगी।

हालाँकि इस विचार के साथ एक सावधानी भी जरूरी है। प्रशिक्षुओं का इस्तेमाल सिर्फ “सस्ता श्रम” बनाकर नहीं होना चाहिए। उनके लिए स्पष्ट प्रशिक्षण, मार्गदर्शन और सीखने का ढांचा होना चाहिए। तभी यह व्यवस्था टिकाऊ और उपयोगी बनेगी।

कई देशों में भी शिक्षा प्रणाली में इंटर्न, फेलो या सामुदायिक स्वयंसेवकों का उपयोग किया जाता है ताकि नियमित शिक्षक का समय मुख्य शिक्षण कार्य के लिए सुरक्षित रखा जा सके।

शिक्षा व्यवस्था में सुधार अक्सर बड़े बजट से नहीं, बल्कि बेहतर प्रबंधन और सही संसाधन उपयोग से आता है। अगर योजनाओं को लागू करते समय यह संतुलन बनाया जाए कि शिक्षक का समय सबसे मूल्यवान है, तो शिक्षा की गुणवत्ता भी सुधरेगी और योजनाएँ भी अधिक प्रभावी होंगी।

FAQ

1. ULLAS कार्यक्रम क्या है?
ULLAS भारत सरकार का वयस्क साक्षरता कार्यक्रम है जिसका उद्देश्य 15 वर्ष से अधिक आयु के निरक्षर लोगों को पढ़ना-लिखना और बुनियादी जीवन कौशल सिखाना है।

2. प्राथमिक शिक्षकों को इस कार्यक्रम में क्या भूमिका दी गई है?
कई राज्यों में प्राथमिक स्कूलों को केंद्र बनाकर शिक्षकों को गाँव से निरक्षर वयस्कों को ढूँढकर पंजीकरण करवाने और उन्हें पढ़ाने का लक्ष्य दिया जाता है।

3. इस तरह के टारगेट से क्या समस्याएँ पैदा होती हैं?
कई गाँवों में पर्याप्त निरक्षर वयस्क नहीं होते, फिर भी शिक्षकों पर संख्या पूरी करने का दबाव होता है, जिससे मानसिक तनाव और औपचारिकता बढ़ती है।

4. क्या प्राथमिक शिक्षक पहले से ही अन्य सरकारी कार्यों में लगे रहते हैं?
हाँ, चुनाव ड्यूटी, सर्वे, जनगणना, स्वास्थ्य और पोषण अभियान जैसे कई गैर-शैक्षणिक कार्य भी अक्सर प्राथमिक शिक्षकों को दिए जाते हैं।

5. इसका असर स्कूल की पढ़ाई पर कैसे पड़ता है?
जब शिक्षक का समय प्रशासनिक कार्यों में अधिक लगने लगता है तो बच्चों की पढ़ाई और कक्षा पर ध्यान कम हो सकता है।

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