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कभी आपने गौर किया है कि बिल्ली जब शिकार करती है और जब अपने ही बच्चे को मुँह में उठाती है, तो दोनों काम वह उसी मुँह और उन्हीं दाँतों से करती है। बाहर से देखने वाले को लग सकता है—दाँत तो वही हैं, पकड़ तो वही है, फिर फर्क क्या है?
लेकिन असल फर्क नियत, उद्देश्य और भाव का होता है।
जब बिल्ली कबूतर या चूहे को पकड़ती है, तो उसकी पकड़ में कसाव होता है, नाखून बाहर होते हैं, दाँत गहरे धँसे होते हैं। वहाँ उद्देश्य स्पष्ट है—भोजन।
लेकिन जब वही बिल्ली अपने छोटे से बच्चे को उठाती है, तो वही दाँत अचानक कोमल हो जाते हैं। पकड़ इतनी सटीक होती है कि बच्चे को ज़रा भी चोट न लगे। दाँत वही हैं, पर भाव पूरी तरह अलग।
यही बात जीवन में ईश्वर की ओर से आने वाली परिस्थितियों पर भी लागू होती है।
हम अक्सर हर परेशानी को “सज़ा” समझ लेते हैं। ज़रा-सा दुख आया नहीं कि मन में सवाल उठने लगता है—
“मैंने क्या गलत किया?”
“भगवान मेरे साथ ही ऐसा क्यों कर रहे हैं?”
लेकिन सच यह है कि हर कष्ट दंड नहीं होता।
कभी-कभी ईश्वर हमें वैसे ही थामते हैं, जैसे बिल्ली अपने बच्चे को—
थोड़ा असहज लगता है, डर लगता है, पर उद्देश्य नुकसान नहीं, सुरक्षा और दिशा देना होता है।
ऐसे समय में परेशानी आती है:
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हमें मजबूत बनाने के लिए
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हमें अहंकार से बाहर निकालने के लिए
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हमें गलत रास्ते से मोड़ने के लिए
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या हमें किसी बड़े नुकसान से बचाने के लिए
यह वे कठिनाइयाँ होती हैं जिनमें दर्द तो होता है, पर भीतर कहीं न कहीं सीख भी होती है। समय के साथ समझ आता है—
“अच्छा हुआ ऐसा हुआ, वरना मैं गलत दिशा में चला जाता।”
लेकिन एक दूसरी स्थिति भी होती है।
जब इंसान बार-बार चेतावनी के बाद भी गलत रास्ते पर चलता रहे,
जब उसे सही-गलत का ज्ञान होते हुए भी वह दूसरों को नुकसान पहुँचाए,
जब अहंकार, क्रूरता और अन्याय उसकी आदत बन जाए—
तब आने वाली चोट अलग होती है।
वह चोट सुधार के लिए नहीं, रोकने के लिए होती है।
वह कष्ट केवल सिखाने के लिए नहीं, भुगताने के लिए होता है।
जैसे शिकार को पकड़ते समय बिल्ली की पकड़ कठोर होती है, वैसे ही ऐसे समय में परिस्थितियाँ भी कठोर हो जाती हैं।
वहाँ कोमलता नहीं होती, वहाँ सीमा तय की जाती है।
हमारी समस्या यह है कि हम दोनों स्थितियों में फर्क नहीं कर पाते।
हर कठिन समय में हम खुद को “शिकार” समझ लेते हैं, जबकि कई बार हम “बच्चे” की तरह सुरक्षित हाथों में होते हैं—बस उस समय हमें यह समझ नहीं आता।
मध्यम वर्ग का आदमी तो खासकर जल्दी टूट जाता है।
थोड़ी आर्थिक परेशानी आई,
नौकरी में तनाव आया,
बच्चों की पढ़ाई में अड़चन आई—
तो मन कहने लगता है, “भगवान ने ही मुँह मोड़ लिया।”
जबकि सच्चाई यह होती है कि शायद ईश्वर हमें ज़्यादा मजबूत, ज़्यादा समझदार और ज़्यादा ज़मीन से जुड़ा इंसान बनाना चाहते हैं।
अगर हर मुश्किल के समय हम यह सवाल पूछ लें—
“क्या यह मुझे सुधारने आई है या रोकने?”
तो आधा बोझ हल्का हो जाता है।
क्योंकि जब सुधार के लिए आई तकलीफ होती है, तो धैर्य, विश्वास और सही कर्म से रास्ता निकल आता है।
और अगर रोकने के लिए आई हो, तो आत्मचिंतन की ज़रूरत होती है—
“कहाँ मैं गलत दिशा में चला गया?”
दाँत वही हैं, पकड़ वही है—
पर भाव अलग है।
यही फर्क समझ में आ जाए, तो जीवन की कई शिकायतें अपने आप शांत हो जाती हैं।
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