- Q1. “मैं तब खुश होऊँगा” मानसिकता क्या है?
- Q2. क्या पैसा और प्रमोशन स्थायी खुशी दे सकते हैं?
- Q3. भारतीय मध्यमवर्ग में सफलता का दबाव क्यों अधिक होता है?
- Q4. क्या परिवार के लिए कमाना ही पर्याप्त है?
- Q5. आत्म-स्वीकार क्यों महत्वपूर्ण है?
- Q6. वर्तमान में जीना क्यों जरूरी है?
- Q7. क्या रिटायरमेंट के बाद ही जीवन का अर्थ समझ आता है?
- Q8. लगातार तुलना करने से क्या प्रभाव पड़ता है?
- Q9. असली सफलता की परिभाषा क्या होनी चाहिए?
- Q10. क्या आज से ही संतोष का अभ्यास शुरू किया जा सकता है?
शाम के साढ़े छह बजे थे। सुरेश शर्मा बालकनी में बैठे नीचे पार्क की ओर देख रहे थे। उनका पोता आरव साइकिल चला रहा था। हर बार लड़खड़ाता, गिरता, फिर उठकर हँस देता। सुरेश के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ जाती।
आरव यहीं उनके साथ रहता था। दरअसल बेटा अमित और बहू भी उसी शहर में थे। कुछ साल पहले अमित की नौकरी दूसरे शहर में लग गई थी, तब सुरेश और सीमा अकेले रह गए थे। वही समय था जब घर की दीवारें बड़ी लगने लगी थीं और कमरे खाली। बाद में अमित की पोस्टिंग वापस इसी शहर में हो गई, तो सबने मिलकर तय किया कि बड़ा फ्लैट लेकर साथ रहेंगे। अब तीन पीढ़ियाँ एक ही छत के नीचे थीं — लेकिन सुरेश अक्सर सोचते थे कि साथ रहने और सच में जुड़े रहने में कितना अंतर होता है।
उन्हें अपने पुराने दिन याद आते थे।
जब अमित छोटा था, तब भी वह यहीं इसी शहर में थे। लेकिन उस समय वह शायद ही कभी पार्क तक उसके साथ आए हों। शनिवार को भी अक्सर ऑफिस का काम घर ले आते। अमित कई बार साइकिल लेकर दरवाज़े तक आता और कहता, “पापा, चलिए न।” सुरेश कहते, “बेटा, अभी बहुत काम है। बाद में चलेंगे।”
वह “बाद में” कभी नहीं आया।
आज जब वह आरव को गिरकर उठते देखते थे, तो उन्हें एहसास होता था कि जिंदगी ने उन्हें दूसरा मौका दिया है। फर्क सिर्फ इतना था कि अब वह समझ चुके थे कि असली कमी कहाँ थी।
बचपन में गरीबी ने उनके भीतर एक डर बैठा दिया था — असुरक्षा का डर। उन्हें लगता था कि अगर पैसा, पद और प्रतिष्ठा नहीं होगी तो कोई सम्मान नहीं करेगा। उन्होंने बैंक की नौकरी में पूरी जान लगा दी। प्रमोशन दर प्रमोशन, जिम्मेदारियाँ बढ़ती गईं। हर साल वह खुद से कहते, “बस यह पद मिल जाए, फिर थोड़ा सुकून लूँगा।” लेकिन हर पद के बाद एक और पद सामने खड़ा हो जाता।
घर में सुविधाएँ बढ़ती गईं — फ्रिज बड़ा, टीवी नया, कार बेहतर। लेकिन बातचीत छोटी होती गई। सीमा कभी-कभी कहतीं, “तुम घर में रहते हो, पर होते नहीं हो।”
तब सुरेश को लगता था कि यह भावुक बात है। वह सोचते थे कि वह तो परिवार के लिए ही मेहनत कर रहे हैं। उन्हें लगता था कि अच्छा पति और अच्छा पिता वही है जो आर्थिक सुरक्षा दे। भावनाएँ, समय, संवाद — ये सब उन्हें “अतिरिक्त” लगते थे।
रिटायरमेंट के बाद जब वह सचमुच घर पर रहने लगे, तब उन्हें पहली बार महसूस हुआ कि उन्होंने घर को जाना ही कितना कम है। सीमा की पसंद, बच्चों के डर, उनकी छोटी-छोटी खुशियाँ — बहुत कुछ उनसे छूट गया था।
अमित की शादी के बाद जब कुछ समय के लिए वह दूसरे शहर चला गया था, तब सुरेश और सीमा अकेले पड़ गए थे। वही समय था जब उन्हें पहली बार अपनी दौड़ की थकान का अहसास हुआ। बैंक बैलेंस ठीक था, घर उनका अपना था, गाड़ी थी, पेंशन थी। पर शामें लंबी थीं। बातचीत कम थी।
उन्हें समझ आने लगा कि वह असल में किसके पीछे भागते रहे। वह पैसा नहीं, बल्कि सम्मान की तलाश में थे। उन्हें लगता था कि अगर वह ऊँचे पद पर पहुँचेंगे तो बचपन की वह हीन भावना मिट जाएगी। लेकिन पद बदलते रहे, भीतर की कमी जस की तस रही।
अब जब अमित वापस इसी शहर में था और सब साथ रहते थे, तो सुरेश ने अपने आप में धीरे-धीरे बदलाव करना शुरू किया। सुबह की चाय अब वह मोबाइल देखते हुए नहीं पीते थे। सीमा कुछ कहतीं तो सचमुच सुनते थे। आरव स्कूल से आता तो उसके बैग से कॉपी निकालकर पूछते, “आज क्या नया सीखा?”
पहले वह सोचते थे कि बच्चों को अच्छी जिंदगी देने का मतलब है उन्हें सुविधाएँ देना। अब उन्हें समझ आया कि अच्छी जिंदगी का मतलब है — उपस्थिति, ध्यान और स्वीकार।
एक दिन रात के खाने पर अमित ने कहा, “पापा, ऑफिस में बहुत दबाव है। कभी-कभी लगता है कि बस अगला प्रमोशन मिल जाए, फिर सब ठीक हो जाएगा।”
सुरेश चुप रहे। यह वही वाक्य था जो उन्होंने अपनी जिंदगी में अनगिनत बार खुद से कहा था। उन्होंने धीरे से कहा, “बेटा, प्रमोशन मिल भी जाएगा। फिर कुछ और चाहिए होगा। यह सिलसिला खत्म नहीं होता। सवाल यह है कि क्या तुम आज संतुष्ट रह सकते हो, या खुशी को हर बार अगले पड़ाव पर टालते रहोगे?”
अमित ने पहली बार उन्हें अलग नजर से देखा।
सुरेश ने आगे कहा, “मैंने बहुत साल ‘मैं तब खुश होऊँगा’ में निकाल दिए। घर ले लिया तो सोचा लोन खत्म हो जाए तब चैन मिलेगा। लोन खत्म हुआ तो सोचा रिटायरमेंट फंड बढ़ जाए तब चैन मिलेगा। चैन कभी नहीं आया, क्योंकि मैं खुद से संतुष्ट नहीं था।”
डाइनिंग टेबल पर कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया। सीमा ने चुपचाप रोटी पर घी लगाया और मुस्कुराईं। उन्हें पता था कि यह बात सुरेश ने सिर्फ अमित से नहीं, खुद से भी कही है।
अब भी सुरेश के जीवन में सब कुछ परफेक्ट नहीं था। घुटनों में दर्द था। कभी-कभी मन में पुरानी यादों का पछतावा भी आता था। लेकिन एक बड़ा फर्क आ गया था — अब वह खुद को दोष देकर नहीं जीते थे। उन्होंने मान लिया था कि वह जैसे हैं, वैसे ही पर्याप्त हैं।
एक शाम आरव ने उनसे पूछा, “दादू, आप बड़े होकर क्या बनना चाहते थे?”
सुरेश हँस पड़े। बोले, “मैं बड़ा होकर ‘कोई’ बनना चाहता था।”
“और बने?” आरव ने मासूमियत से पूछा।
सुरेश ने कुछ पल सोचा, फिर कहा, “अब समझ आया कि मुझे ‘कोई’ नहीं, बस ‘मैं’ बनना था। और वह बनने में पूरी जिंदगी लग गई।”
आरव शायद पूरी बात नहीं समझा, लेकिन उसने दादू का हाथ पकड़ लिया।
बालकनी में खड़े होकर सुरेश ने नीचे पार्क की ओर देखा। बच्चों की हँसी गूँज रही थी। उन्हें लगा, जिंदगी दरअसल यहीं है — इन छोटी-छोटी आवाज़ों में, इन पलों में। मंज़िल कहीं दूर नहीं, यह वर्तमान ही है।
अब वह किसी बड़े बदलाव का इंतज़ार नहीं करते थे। अब वह हर सुबह खुद से कहते थे, “आज जो है, वही काफी है। मैं जैसा हूँ, वैसा ठीक हूँ।”
और शायद पहली बार, इतने वर्षों में, उन्हें सचमुच शांति महसूस होती थी।
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