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प्रकृति को शर्मिंदा मत कीजिए – जानवरों के प्रति सही समझ और संवेदनशीलता


प्रकृति की प्रक्रिया को समझना क्यों जरूरी है

आम गलत धारणाएँ और उनके परिणाम

यह एक ऐसा विषय है जो रोज़ हमारी आँखों के सामने होता है, फिर भी या तो हँसी में उड़ा दिया जाता है, या शर्म के नाम पर छुपा दिया जाता है।

दुर्भाग्य से, जानकारी की कमी और सामाजिक दबाव के कारण इस दौरान जानवरों को जो शारीरिक और मानसिक पीड़ा दी जाती है, वह चुपचाप अनदेखी कर दी जाती है। डंडे, पत्थर, पानी, मिर्च या ज़ोर-ज़बरदस्ती—ये सब तरीके इंसानों की बेचैनी को तो शांत कर देते हैं, लेकिन बेज़ुबान जानवरों की ज़िंदगी में स्थायी दर्द और चोट छोड़ जाते हैं। यह ब्लॉग उसी चुप्पी को तोड़ने की एक कोशिश है—ताकि हम समझ सकें कि असल समस्या कुत्ते नहीं हैं, बल्कि हमारी गलत धारणाएँ हैं, और थोड़ी-सी सही जानकारी कैसे बड़ी क्रूरता को रोक सकती है।

जब नर और मादा कुत्ते अंत में “जुड़” जाते हैं, तो यह कोई बीमारी, दुर्घटना या फँसना नहीं होता। यह प्रकृति की एक सामान्य जैविक प्रक्रिया है, जिसे टाई कहा जाता है। इसमें नर कुत्ते का अंग कुछ समय के लिए सूज जाता है और मादा के अंदर फँसा रहता है, ताकि गर्भाधान सही तरीके से हो सके। यह प्रक्रिया 5 मिनट से लेकर 30 मिनट तक चल सकती है। इस दौरान दोनों कुत्तों को दर्द नहीं होता, अगर इंसान बीच में दखल न दे। भारत में, विशेषकर गली-मोहल्लों और ग्रामीण इलाकों में, जब आवारा नर और मादा कुत्ते कुछ समय के लिए आपस में जुड़े दिखाई देते हैं, तो लोगों की प्रतिक्रिया अक्सर असहज, मज़ाकिया या क्रूर हो जाती है। कोई तमाशा देखने लगता है, कोई गालियाँ देता है, और कोई “अच्छा काम” समझकर उन्हें ज़बरदस्ती अलग करने दौड़ पड़ता है। बहुत कम लोग यह समझते हैं कि यह कोई ग़लत या शर्मनाक हरकत नहीं, बल्कि प्रकृति की एक सामान्य और ज़रूरी प्रक्रिया है।

इसी वजह से कुत्तों के प्राइवेट पार्ट फट जाते हैं, अंदरूनी रक्तस्राव होता है, संक्रमण हो जाता है, और कई बार नर कुत्ता जीवन भर के लिए अपंग हो जाता है या मर भी जाता है।

सबसे आसान, सुरक्षित और इंसानियत भरा तरीका क्या है?

सबसे पहले, दिमाग में यह बात बैठा लें: उन्हें अलग करने की कोई ज़रूरत ही नहीं है।
प्रकृति ने जो जोड़ा है, वही खुद अलग करेगी। अगर आप कुछ भी नहीं करते, बस थोड़ी दूरी बनाकर खड़े रहते हैं, तो कुछ ही मिनटों में वे अपने आप अलग हो जाते हैं और सामान्य रूप से चल देते हैं। न खून, न दर्द, न नुकसान।

अगर भीड़ इकट्ठा हो रही है या कुत्ते डर रहे हैं, तो सबसे अच्छा काम है:
लोगों को दूर करना
शोर न मचाना
पत्थर, डंडा, पानी, कुछ भी न फेंकना

डरे हुए कुत्तों की मांसपेशियाँ और कस जाती हैं, जिससे अलग होने में ज़्यादा समय लगता है। शांत माहौल = जल्दी और सुरक्षित अलगाव।

अगर किसी वजह से दोनों बहुत घबराए हुए हैं (जो अक्सर इंसानों की वजह से ही होता है), तो केवल इतना किया जा सकता है:
उनके आसपास एक चादर, बोरी या गत्ता खड़ा करके उन्हें थोड़ा प्राइवेसी दे दी जाए
बस। इससे वे रिलैक्स होते हैं और प्रक्रिया पूरी कर लेते हैं।

कोई भी तेल, पानी, साबुन, मिर्च, डंडा, या ज़ोर-ज़बरदस्ती कभी नहीं। यह सीधी-सी बात है—जिस अंग को प्रकृति ने फैलाया है, उसे आप ज़बरदस्ती खींचेंगे तो वह फटेगा ही।

यह भी समझना ज़रूरी है कि यह “गंदी चीज़” नहीं है। गंदा हमारा सोचने का तरीका है। वही समाज जो खुलेआम हिंसा, गाली और अश्लील मज़ाक सह लेता है, उसे दो बेज़ुबान जानवरों की प्राकृतिक प्रक्रिया “शर्मनाक” लगती है—यह बहुत बड़ी विडंबना है।
जो व्यक्ति ऐसे समय कुत्तों को मारता, खींचता या नुकसान पहुँचाता है, वह अज्ञान ही नहीं, बल्कि क्रूर है। और यह क्रूरता कानूनन भी गलत है।

अगर हम सच में जानवरों से प्यार या दया की बात करते हैं, तो कम से कम इतना तो कर सकते हैं कि:
उन्हें उनकी प्रक्रिया पूरी करने दें
दूसरों को समझाएँ
और अगर संभव हो, तो भविष्य में नसबंदी (sterilization) जैसे स्थायी, मानवीय समाधान का समर्थन करें

दुख की बात यह है कि लोग सोचते हैं कि वे “अच्छा” कर रहे हैं—कुत्तों को अलग करके, “शर्म” मिटाकर—जबकि असल में वे जानवरों को ऐसी चोट दे देते हैं, जिसका दर्द उन्हें ज़िंदगी भर भुगतना पड़ता है।

अगर कोई व्यक्ति एक जगह खड़ा होकर लोगों को रोक दे, सिर्फ़ इतना कह दे कि
ये सामान्य प्रक्रिया है, नुकसान मत पहुँचाओ”,
तो वह अकेला इंसान भी बड़ा काम कर देता है।


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