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जो अंत तक नहीं रुकता, वही जीतता है: निरंतरता vs रफ्तार – कौन जीतेगा?

निरंतरता ही सफलता की असली कुंजी है: रफ्तार नहीं, Consistency मायने रखती है

  • निरंतरता सफलता की कुंजी क्यों मानी जाती है?
  • रफ्तार और निरंतरता में क्या अंतर है?
  • Consistency कैसे बनाए रखें जब मोटिवेशन कम हो जाए?
  • क्या टैलेंट से ज्यादा निरंतरता जरूरी है?
  • सफलता के लिए कितने समय तक निरंतर प्रयास करने चाहिए?

मैं आज आपसे किसी बड़ी किताब की बात नहीं कर रहा, न ही किसी बहुत अमीर इंसान की कहानी सुना रहा हूँ। मैं आपसे दिल्ली की रोज़मर्रा की ज़िंदगी की बात कर रहा हूँ, वही ज़िंदगी जो आप रोज़ अपनी आँखों से देखते हो। सुबह बस स्टॉप पर खड़े लोग, मेट्रो में भीड़, सड़क किनारे चाय बेचता आदमी, और किसी वर्कशॉप में काम करता लोहे का कारीगर। क्या आपने कभी गौर किया है कि ये लोग बहुत तेज़ नहीं चलते, लेकिन फिर भी रोज़ आगे बढ़ते रहते हैं?

अब सोचो उस लोहे के कारीगर के बारे में। बहुत पढ़ा-लिखा नहीं है, कोई बड़ा ओहदा नहीं है, लेकिन रोज़ सुबह समय पर उठता है, काम पर जाता है, पसीना बहाता है। क्या वह रोज़ खुश होता है? नहीं। क्या उसे रोज़ मन करता है? शायद नहीं। लेकिन फिर भी वह रुकता नहीं है। क्योंकि उसे पता है कि जिस दिन वह रुक गया, उसी दिन उसकी ज़िंदगी भी रुक जाएगी।

अब मैं आपसे एक सवाल पूछता हूँ—आपमें से कितनों को कभी लगा है कि “मुझसे नहीं होगा”? गणित समझ नहीं आता, अंग्रेज़ी में डर लगता है, नंबर कम आ जाते हैं, और मन करता है सब छोड़ देने का। यह सोच बहुत स्वाभाविक है। लेकिन याद रखो, समस्या यह नहीं है कि तुम धीरे चल रहे हो, समस्या तब होती है जब तुम चलना ही छोड़ देते हो।

बच्चो, ज़िंदगी कोई सौ मीटर की दौड़ नहीं है। यह एक लंबी यात्रा है। यहाँ जीत उसी की होती है जो गिरकर भी खड़ा हो जाए। अगर आज तुम सिर्फ़ आधा घंटा पढ़ पा रहे हो, तो वही बहुत है। अगर आज सिर्फ़ दो सवाल सही हो रहे हैं, तो भी तुम आगे बढ़ रहे हो। धीरे-धीरे। लेकिन बढ़ रहे हो।

दिल्ली के छोटे-छोटे घरों में रहने वाले बहुत से बच्चे हैं जिनके पास अलग कमरा नहीं है, शांति नहीं है, महंगे कोचिंग नहीं हैं। लेकिन फिर भी वे रोज़ कोशिश करते हैं। क्या आपको लगता है कि सफल लोग एक दिन में बन जाते हैं? नहीं बच्चो, वे रोज़ थोड़ा-थोड़ा चलते हैं।

और हाँ, तुलना मत करो। सामने बैठा दोस्त तेज़ है, कोई और जल्दी समझ लेता है—इसका मतलब यह नहीं कि तुम कमजोर हो। हर इंसान की रफ़्तार अलग होती है। मेट्रो में भी कोई स्टेशन जल्दी आता है, कोई देर से, लेकिन ट्रेन सबको मंज़िल तक ले जाती है।

याद रखो, रुकना सबसे खतरनाक है। थक जाना गलत नहीं है। ब्रेक लेना गलत नहीं है। लेकिन हार मान लेना, कोशिश छोड़ देना—यही असली हार है।

इसलिए आज मैं आपसे बस यही कहना चाहता हूँ—तेज़ चलो या धीरे चलो, फर्क नहीं पड़ता। बस चलते रहो। रोज़ थोड़ा आगे बढ़ो। क्योंकि जो रुकता नहीं, वही एक दिन वहाँ पहुँचता है जहाँ आज सिर्फ़ सपने खड़े हैं।

जब तक चलते रहोगे, मंज़िल पास आती रहेगी

दिल्ली के बाहरी इलाके की एक तंग-सी गली में रहने वाला अमित रोज़ सुबह पाँच बजे उठ जाता था। उसका घर छोटा था—एक कमरा, एक रसोई और बाहर साझा शौचालय। पिताजी पास की एक लोहे की वर्कशॉप में काम करते थे और माँ घरों में बर्तन माँजती थीं। अमित नौवीं कक्षा का छात्र था। पढ़ाई में न बहुत तेज़, न बहुत पीछे। बस औसत। लेकिन उसके मन में एक डर हमेशा रहता था—“मैं कभी आगे बढ़ पाऊँगा भी या नहीं?”

स्कूल जाना उसके लिए आसान नहीं था। कभी किताबें पूरी नहीं होतीं, कभी होमवर्क अधूरा रह जाता। गणित उसका सबसे बड़ा डर था। जब भी अध्यापक बोर्ड पर सवाल लिखते, अमित की नज़रें नीचे झुक जातीं। उसके दोस्त तेज़ थे, सवाल जल्दी हल कर लेते थे। कई बार हँसी भी उड़ाते थे। एक दिन अमित ने मन ही मन तय कर लिया—“मुझसे नहीं होगा।”

उसी दिन शाम को वह अपने पिताजी के पास वर्कशॉप चला गया। पिताजी पसीने में भीगे, हथौड़ा चलाते हुए लोहे को सीधा कर रहे थे। हाथों में पुराने ज़ख्म, आँखों में थकान। अमित चुपचाप एक कोने में बैठ गया। काफी देर बाद उसने पूछा, “पापा, आप रोज़ यही काम करते हो, थकते नहीं हो?”

पिताजी मुस्कराए। बोले, “थकता तो हूँ बेटा, लेकिन रुक नहीं सकता। अगर एक दिन काम पर न जाऊँ, तो घर कैसे चलेगा?” फिर उन्होंने हथौड़ा रखा और बोले, “लोहे को भी देख, एक बार में सही आकार नहीं आता। बार-बार चोट लगती है, धीरे-धीरे सही बनता है।”

ये बात अमित के मन में कहीं अटक गई।

अगले दिन स्कूल में फिर गणित की क्लास थी। सवाल फिर वही डरावना लगा। लेकिन इस बार अमित ने किताब बंद नहीं की। उसे पूरा सवाल समझ नहीं आया, लेकिन उसने पहला स्टेप लिखा। गलत था, पर लिखा। अध्यापक ने टोका नहीं, बस कहा, “कोशिश ठीक है।”

उस दिन अमित ने कोई चमत्कार नहीं किया। नंबर नहीं बढ़े। लेकिन उसने पढ़ाई छोड़ी नहीं। रोज़ आधा घंटा गणित के सवाल देखता। कई बार वही सवाल दो-दो दिन लग जाते। दोस्त आगे निकलते रहे, वह धीमा ही रहा। लेकिन अब वह रुक नहीं रहा था।

कभी-कभी मन बहुत टूटता। एक दिन कम नंबर आने पर उसने किताब फेंक दी। माँ ने देखा और चुपचाप किताब उठाकर रख दी। बस इतना बोली, “बेटा, पढ़ाई छोड़ने से कुछ नहीं बदलेगा, कोशिश से बदलेगा।” कोई भाषण नहीं, कोई डाँट नहीं।

समय बीतता गया। नौवीं खत्म हुई, दसवीं शुरू हो गई। अमित अब भी टॉपर नहीं था। लेकिन जो कभी सवाल से डरता था, अब सवाल को पढ़ तो लेता था। जो कभी हाथ उठाने से डरता था, अब कभी-कभी उत्तर देने की कोशिश करता था—गलत ही सही।

दसवीं के बोर्ड आए। अमित को खुद पर भरोसा नहीं था, लेकिन उसने परीक्षा दी। रिज़ल्ट आया—न बहुत अच्छे नंबर, न बहुत खराब। पास हो गया। घर में खुशी थी। पिताजी ने बस इतना कहा, “देखा, रुका नहीं, इसलिए आगे बढ़ा।”

अमित को उस दिन समझ आया कि जीत हमेशा सबसे आगे आने से नहीं होती। जीत होती है हार न मानने में। धीरे चलना कोई गुनाह नहीं है। गुनाह है रुक जाना।

आज अमित ग्यारहवीं में है। रास्ता अभी लंबा है। मुश्किलें अब भी हैं। लेकिन अब उसके मन में एक बात साफ़ है—जब तक वह चलता रहेगा, चाहे धीरे ही सही, उसकी मंज़िल उससे दूर नहीं जाएगी।

रफ्तार नहीं, निरंतरता मायने रखती है

घने जंगल के बाहर एक लंबा और कठिन रास्ता था। हर तीन साल में वहाँ एक बड़ी दौड़ रखी जाती थी। यह कोई साधारण दौड़ नहीं थी। इसमें रफ्तार से ज़्यादा ज़रूरी था धैर्य, समझ और लगातार आगे बढ़ने की क्षमता।

इस बार दौड़ में तीन प्रमुख जानवर थे।

पहला था चीतलबहुत तेज़, बहुत फुर्तीला।
दूसरा था भालूबेहद ताकतवर, सहनशक्ति से भरा।
तीसरी थी जंगली बिल्लीन बहुत तेज़, न बहुत ताकतवर, लेकिन शांत और समझदार।

दौड़ शुरू हुई।

चीतल शुरुआत में ही बिजली की तरह आगे निकल गया।
सबको लगा, वही जीतेगा।

भालू ने भी ज़ोरदार शुरुआत की।
उसने सोचा,
मेरे पास ताकत है, मैं लगातार तेज़ चलता रहूँगा।”

लेकिन यहीं उसकी पहली गलती थी।

भालू ने अपनी ताकत को समझदारी से बाँटा नहीं
वह यह सोचता रहा कि
मैं मजबूत हूँ, थकान मुझे जल्दी नहीं आएगी।”

पहले दिन के अंत तक वह बहुत आगे था,
लेकिन उसका शरीर ज़रूरत से ज़्यादा थक चुका था।

दूसरे दिन रास्ता चढ़ाई वाला था।
भालू ने फिर भी अपनी चाल धीमी नहीं की।
उसने ब्रेक लेना कमजोरी समझा।

यही उसकी दूसरी गलती थी।

धीरे-धीरे उसकी साँस भारी होने लगी।
पैरों में दर्द बढ़ने लगा।
वह चल तो रहा था, लेकिन अब अपने शरीर की आवाज़ नहीं सुन रहा था

अब जंगली बिल्ली को देखिए।

दौड़ से पहले उसने रास्ते को ध्यान से समझा था।
उसे पता था कहाँ धूप ज़्यादा होगी,
कहाँ चढ़ाई आएगी।

उसने तय किया था —
मुझे दौड़ जीतनी नहीं है,
मुझे दौड़ पूरी करनी है।”

वह शुरुआत में जानबूझकर पीछे रही।
उसकी चाल बराबर थी।

जब धूप तेज़ होती, वह गति कम कर देती।
जब रास्ता आसान होता, थोड़ा तेज़ हो जाती।

वह खुद से बार-बार पूछती,
क्या मैं इसी रफ्तार से कल भी चल पाऊँगी?”

अगर जवाब नहीं होता,
तो वह तुरंत अपनी चाल बदल लेती।

भालू उसे देखकर सोचता,
यह बहुत धीरे चल रही है, इससे क्या होगा?”

यह उसकी तीसरी गलती थी —
दूसरों को कम आँकना और खुद पर ज़्यादा भरोसा करना

तीसरे दिन भालू की हालत बिगड़ने लगी।
ताकत होते हुए भी शरीर साथ नहीं दे रहा था।
वह रुक-रुक कर चलने लगा।

चीतल तो पहले ही थककर बैठ चुका था।

अब आख़िरी दिन था।

मंज़िल पास थी।

आख़िरी दिन रास्ता सबसे कठिन था।

भालू ने पूरी ताकत लगाकर गति बढ़ाई,
लेकिन उसका शरीर अब साथ नहीं दे रहा था।
साँस बार-बार टूट रही थी।
हर कुछ कदम पर उसे रुकना पड़ रहा था।

वह देख रहा था कि मंज़िल पास है,
लेकिन वह अपनी गति बनाए नहीं रख पा रहा था।

उसी समय, जंगली बिल्ली पीछे से आती दिखी।
उसकी चाल तेज़ नहीं थी,
लेकिन बिलकुल स्थिर थी

भालू ने आख़िरी कोशिश की,
लेकिन वह पूरी दूरी एक साथ तय नहीं कर पाया।
वह बीच में बैठ गया —
सिर्फ़ कुछ मिनटों के लिए।

जब वह फिर उठा,
तब तक जंगली बिल्ली अंतिम रेखा पार कर चुकी थी।

कुछ देर बाद भालू भी मंज़िल पर पहुँचा —
थका हुआ, लेकिन दौड़ पूरी करने की संतुष्टि के साथ।

सभा में यह साफ़ था:

  • जंगली बिल्ली पहले स्थान पर थी
  • भालू दूसरे स्थान पर
  • और चीतल दौड़ पूरी नहीं कर पाया

भालू ने खुद स्वीकार किया,
मेरे पास ताकत थी,
लेकिन मैंने उसे अंत तक सँभालकर नहीं रखा।”

बुज़ुर्ग निर्णायक ने कहा,
आज यह स्पष्ट हो गया है —
जो अंत तक चल पाता है,
वही सच में आगे पहुँचता है।”

रफ्तार नहीं, निरंतरता मायने रखती है।

 2026 में सफल होने का सबसे आसान नियम: रफ्तार नहीं, निरंतरता अपनाएं

 

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