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कठिन परिस्थितियाँ ईश्वर की सज़ा नहीं, भरोसे का संकेत क्यों होती हैं?

संघर्ष से मजबूत बनता इंसान
  • क्या कठिन परिस्थितियाँ ईश्वर की सज़ा होती हैं?
  • ईश्वर हमें निर्भर क्यों नहीं बनाते?
  • जीवन की कठिनाइयाँ हमें क्या सिखाती हैं?
  • प्रार्थना के बाद भी दुख क्यों आता है?
  • ईश्वर का भरोसा कैसे समझें?
  • दर्द के बीच शांति कैसे पाई जा सकती है?
  • कठिन समय इंसान को कैसे मजबूत बनाता है?

हम बड़े मासूम होते हैं जब ईश्वर से कहते हैं, “बस शांति दे दो।”

मानो शांति कोई Amazon की डिलीवरी हो—ऑर्डर किया और अगले दिन दरवाज़े पर रखी मिले।

ईश्वर शायद ऊपर बैठकर हल्का सा मुस्कराते हैं और कहते हैं,
अरे वाह! शांति चाहिए? ठीक है… पहले ज़रा ट्रैफिक में फँस कर दिखाओ,
घर में बहस झेलो, ऑफिस में बेवजह की टेंशन लो,
और फिर बताओ—गुस्सा करोगे या शांत रहोगे?”

यही तो मज़ा है।
ईश्वर शांति देते नहीं,
वे हमें ऐसे हालात देते हैं जहाँ शांति चुननी पड़ती है

और हम?
हम हर बार वही पुरानी गलती करते हैं—
हालात को कोसते हैं, लोगों को दोष देते हैं,
और फिर कहते हैं, “भगवान, शांति क्यों नहीं मिल रही?”

भाई, शांति कोई इनाम नहीं है।
शांति एक स्किल है।
और हर स्किल की तरह, वह प्रैक्टिस से आती है—
बुरे हालात में।

अब दर्द की बात करो।
हम कहते हैं, “हे प्रभु, बस दर्द मत देना।”
और जीवन कहता है, “ठीक है… पकड़ो ज़िम्मेदारी, रिश्ते, उम्मीदें और असफलताएँ।”

दर्द आता है,
लेकिन उसके साथ आता है एक चुपचाप सवाल—
अब टूटोगे या मजबूत बनोगे?”

अगर जीवन हमें हर दर्द से बचा ले,
तो हम काँच के खिलौने बन जाएँ।
चमकदार, लेकिन ज़रा सी ठोकर में बिखरने वाले।

ईश्वर हमें दर्द से बचाकर कमजोर नहीं बनाते,
वे दर्द देकर मजबूत बनाते हैं।
फर्क बस इतना है कि हम दर्द पर ध्यान देते हैं,
और ताक़त को नज़रअंदाज़ कर देते हैं जो उसी दर्द से पैदा हो रही होती है।

सोचो ज़रा—
अगर गिरना न होता, तो संभलना कहाँ से सीखते?
अगर हार न होती, तो भीतर की ज़िद कैसे जागती?
अगर आँसू न होते, तो दिल नरम कैसे रहता?

ईश्वर हमें आसान ज़िंदगी नहीं देते,
वे हमें काबिल ज़िंदगी देते हैं।

हम चाहते हैं कि सब ठीक हो जाए,
वे चाहते हैं कि हम ठीक हो जाएँ

और सबसे मज़ेदार बात?
जब हम किसी मुश्किल दौर से निकल आते हैं,
तो पीछे मुड़कर कहते हैं,
अच्छा हुआ ये सब हुआ… नहीं तो मैं आज जैसा नहीं होता।”

मतलब उस वक़्त भगवान गलत थे,
और आज अचानक सही हो गए?
नहीं।
हमारी समझ देर से पहुँची।

तो अगली बार जब ज़िंदगी थोड़ा ज़्यादा तीखा स्वाद दे,
तो इसे सज़ा मत समझना।
यह ट्रेनिंग है।

ईश्वर ने तुम्हें कमज़ोर समझकर नहीं,
बल्कि काबिल समझकर यह अध्याय दिया है।

और यकीन मानो—
जिस दिन तुम शांति को हालात से नहीं,
अपने भीतर से निकालना सीख लोगे,
उस दिन ईश्वर को कुछ देने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी।

क्योंकि तब
तुम खुद वही बन चुके हो
जो तुम माँग रहे थे।

शायद ईश्वर की सबसे बड़ी कृपा यही है कि वे हमें तैयार करते हैं, निर्भर नहीं बनाते। वे हमें सहारा देने के बजाय सक्षम बनाते हैं। और जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तब समझ आता है कि जिन परिस्थितियों को हमने सज़ा समझा था, वही हमें वह इंसान बना गईं जो आज हम हैं।

इसलिए अगली बार जब प्रार्थना के बाद भी जीवन कठिन लगे, तो यह मान लेना चाहिए कि ईश्वर ने हमें नज़रअंदाज़ नहीं किया, बल्कि हम पर भरोसा किया है। उन्होंने समझ लिया है कि अब हम इतने मजबूत हो चुके हैं कि इस रास्ते पर खुद चल सकते हैं, शांति को खुद चुन सकते हैं, और दर्द के बीच भी मुस्कराना सीख सकते हैं। यही जीवन की सबसे सुंदर सच्चाई है।

 

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