Civic Sense का अर्थ और उसका वास्तविक महत्व
समाज में Civic Sense की कमी क्यों दिखाई देती है
बच्चों और युवाओं में Civic Sense कैसे विकसित करें
किसी भी शहर की सुबह अगर ध्यान से देखी जाए तो सबसे पहले जो चीज़ नज़र आती है, वह है अव्यवस्था को सामान्य मान लेने की आदत। सड़क पर चलते लोग, वाहन चलाते ड्राइवर, चाय की दुकानों पर खड़े ग्राहक, सब कुछ जैसे अपने ही नियमों पर चलता है। फुटपाथ पर चलना अब पैदल चलने वालों का अधिकार नहीं रहा, वहाँ दोपहिया वाहन खड़े मिलते हैं और पैदल चलने वाला सड़क पर उतरने को मजबूर होता है। जो व्यक्ति नियम से चलता है, वह हर कदम पर असहज महसूस करता है, जैसे वह इस दुनिया का नहीं बल्कि किसी और ज़माने का इंसान हो। ट्रैफिक सिग्नल पर लाल बत्ती जलते ही कुछ लोग रुकते हैं, पर पीछे से हॉर्न बजने लगता है, मानो नियम का पालन करना कोई अपराध हो और उसे तोड़ना समझदारी की निशानी। कई बार तो लोग खुद बच्चों को यह कहते सुने जाते हैं कि कोई पुलिस नहीं है, जल्दी निकल लो, जिससे बच्चे बहुत कम उम्र में यह सीख लेते हैं कि नियम परिस्थिति देखकर तोड़े जाते हैं, निभाए नहीं जाते।
घर के भीतर स्थिति
कुछ अलग नहीं होती। घर वह जगह होती है जहाँ से संस्कार शुरू होने चाहिए, पर अक्सर वही जगह पहली चूक बन जाती है। मेहमान आए हों तो
बच्चों को कहा जाता है कि आवाज़ मत करो, पर
वही बच्चा अगर बाहर किसी के दरवाज़े पर ज़ोर से चिल्ला दे या पड़ोसी की दीवार पर
गेंद मार दे तो माता-पिता मुस्कुरा कर कह देते हैं कि बच्चा है, समझदार थोड़े ही है। धीरे-धीरे बच्चे के मन में यह बैठ जाता है
कि मेरी गलती मेरी नहीं है,
मेरी उम्र की है। घर के बड़े जब कूड़ा खिड़की
से बाहर फेंकते हैं,
सार्वजनिक जगह पर थूकते हैं या बिना
सोचे किसी घरेलू कामगार से ऊँची आवाज़ में बात करते हैं, तब बच्चा बिना किसी किताब के सीख जाता है कि ताकतवर होना ही
सही होना है।
स्कूल में civic sense पढ़ाई नहीं जाती, यह
सच है, पर वहाँ इसे महसूस जरूर कराया जा सकता है, जो अक्सर नहीं हो पाता। प्रार्थना सभा में शांति की बातें होती
हैं, पर असेंबली खत्म होते ही बच्चे धक्का-मुक्की करते हुए कक्षा की
ओर भागते हैं और शिक्षक भी इसे सामान्य मान लेते हैं। स्कूल बस में सीट को पैर से
मारना, खिड़की से हाथ बाहर निकालना, बस
ड्राइवर पर चिल्लाना,
यह सब बच्चे नहीं, बल्कि उनके व्यवहार में झलकते घर के संस्कार होते हैं। जब
अभिभावक मीटिंग में माता-पिता शिक्षक से कहते हैं कि मेरा बच्चा तो कभी गलत हो ही
नहीं सकता, तब शिक्षक भी समझ जाता है कि सुधार की
गुंजाइश यहाँ बहुत कम है।
सरकारी दफ्तरों में
लाइनें बनी होती हैं,
पर लाइन का मतलब सिर्फ बोर्ड पर लिखा
शब्द होता है, व्यवहार में नहीं। जो व्यक्ति चुपचाप
अपनी बारी का इंतज़ार करता है,
उसे बार-बार पीछे धकेला जाता है और जो
ज़ोर से बोलता है,
आगे बढ़ जाता है। अजीब बात यह है कि
पीछे खड़े लोग भी गलत के खिलाफ आवाज़ उठाने के बजाय चुप रहते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि झगड़ा क्यों मोल लिया जाए। इस
चुप्पी में ही असभ्यता पलती है और सभ्य व्यक्ति धीरे-धीरे खुद को अकेला महसूस करने
लगता है। यहाँ ईमानदारी और शांति को कमजोरी समझ लिया जाता है, और जो नियमों का पालन करता है, उसे
समय की बर्बादी माना जाता है।
शादी, भोज और सामाजिक कार्यक्रम भारतीय समाज का अभिन्न हिस्सा हैं, लेकिन यहीं पर civic sense की
सबसे बड़ी परीक्षा होती है,
जिसमें हम अक्सर फेल हो जाते हैं। खाने
की प्लेटों में जरूरत से ज़्यादा भरना, आधा
खाना छोड़ देना, बच्चों को पूरी थाली लेकर खेलने देना, यह सब देखकर भी कोई कुछ नहीं कहता। लोग इसे अपना हक समझते हैं
कि पैसा दिया है तो चाहे जितना बर्बाद करें। बहुत कम लोग यह सोचते हैं कि यही आदत
बच्चों में भी जा रही है और कल वही बच्चा भोजन की कद्र करना नहीं सीखेगा। जो
व्यक्ति सीमित मात्रा में खाना लेता है, उसे
मज़ाक का पात्र बना दिया जाता है और कहा जाता है कि इतनी कंजूसी क्यों करते हो, जबकि असल में वही व्यक्ति ज़िम्मेदारी निभा रहा होता है।
सार्वजनिक परिवहन में
सफर करते समय भी यही कहानी दोहराई जाती है। बुज़ुर्ग खड़े हों, महिलाएँ परेशान हों, फिर
भी युवा सीट छोड़ने की ज़रूरत नहीं समझते, और
अगर कोई छोड़ देता है तो उसके दोस्तों द्वारा उसे पुराने ज़माने का कहकर चिढ़ाया
जाता है। ट्रेन में कूड़ा फेंकने के लिए डस्टबिन मौजूद होती है, फिर भी लोग खिड़की से बाहर फेंकना आसान समझते हैं, क्योंकि किसी ने रोका नहीं और किसी ने सिखाया नहीं कि
सार्वजनिक जगह भी हमारी अपनी ही होती है।
सबसे दुखद स्थिति तब
होती है जब एक सच्चा,
नियम मानने वाला और संवेदनशील व्यक्ति
बार-बार नुकसान में पड़ता है। उसे काम में देर होती है, लोग उसे चालाक नहीं बल्कि मूर्ख समझते हैं, और कई बार वही व्यक्ति खुद से सवाल करने लगता है कि क्या उसका
सही होना इस समाज में गलत है। लेकिन यही वह क्षण होता है जहाँ असली civic sense की परीक्षा होती है, क्योंकि
सही व्यक्ति वही है जो नुकसान में भी गलत नहीं सीखता। बच्चे जब ऐसे व्यक्ति को
देखते हैं, चाहे वह उनके माता-पिता हों, दादा-दादी हों या कोई साधारण नागरिक, तब उनके भीतर एक बीज पड़ता है, जो
देर से सही, पर मजबूत बनता है।
असल समस्या यह नहीं
है कि civic sense सिखाई नहीं जाती, असली
समस्या यह है कि उसे जिया नहीं जाता। जब तक हम अपने रोज़मर्रा के व्यवहार में
छोटे-छोटे नियमों को महत्व नहीं देंगे, तब
तक बड़ी-बड़ी बातें सिर्फ भाषण बनकर रह जाएँगी। सभ्यता का मतलब पढ़ा-लिखा होना
नहीं, बल्कि इतना संवेदनशील होना है कि हमारे व्यवहार से किसी और की
ज़िंदगी मुश्किल न हो। और शायद यही वह सच्ची शिक्षा है, जो किताबों से नहीं, बल्कि
सही उदाहरणों से ही आगे बढ़ती है।
जब किसी समाज में
असभ्यता धीरे-धीरे सामान्य हो जाती है, तब
सबसे खतरनाक बात यह नहीं होती कि लोग गलत करने लगते हैं, बल्कि यह होती है कि सही करने वाले लोग भी थककर चुप हो जाते
हैं। यही चुप्पी अगली पीढ़ी के लिए सबसे बड़ा संदेश बनती है। बच्चा जो देखता है, वही सीखता है,
और जो नहीं देखता, उसे वह कभी गंभीरता से नहीं लेता। जब वह देखता है कि उसके
माता-पिता ट्रैफिक नियम तोड़कर समय बचा लेते हैं, लाइन
तोड़कर काम जल्दी करवा लेते हैं,
या झूठ बोलकर किसी छोटे नियम से निकल
जाते हैं, तब उसके मन में यह बैठ जाता है कि ईमानदारी सिर्फ किताबों और
भाषणों के लिए होती है,
असली ज़िंदगी में नहीं।
आज का बच्चा बहुत
तेज़ है, लेकिन वह उतना ही उलझा हुआ भी है। वह स्कूल में नैतिक शिक्षा
की बातें सुनता है,
घर में सुविधा की बातें देखता है, और समाज में ताकत की जीत देखता है। ऐसे में उसके भीतर यह भ्रम
पैदा होता है कि सही और गलत कोई स्थायी चीज़ नहीं है, बल्कि हालात के हिसाब से बदला जा सकता है। जब माता-पिता यह
कहते हैं कि बच्चा अभी छोटा है,
समझदार नहीं है, तब असल में वे खुद यह भूल जाते हैं कि यही उम्र सबसे ज़्यादा
सीखने की होती है। आदतें धीरे-धीरे नहीं, बल्कि
रोज़मर्रा के छोटे व्यवहारों से बनती हैं, जैसे
दरवाज़ा बंद करते समय ध्यान रखना,
किसी को बीच में न काटना, सार्वजनिक जगह पर आवाज़ नियंत्रित रखना, और गलती होने पर बिना डर के माफी माँग लेना।
भारतीय समाज में एक
और समस्या गहराई से जड़ें जमा चुकी है, और
वह है यह सोच कि civic
sense दूसरों के लिए होती
है, हमारे लिए नहीं। हम चाहते हैं कि सड़क साफ हो, लेकिन खुद कचरा फेंक देते हैं। हम चाहते हैं कि बच्चे अनुशासित
हों, लेकिन खुद मोबाइल पर चिल्लाते हुए बात करते हैं। हम चाहते हैं
कि कर्मचारी ईमानदार हों,
लेकिन खुद छोटा सा फायदा देखकर नियम
तोड़ लेते हैं। यह दोहरा मापदंड बच्चों के मन में सबसे गहरा असर डालता है, क्योंकि वे समझ जाते हैं कि बातें और व्यवहार अलग-अलग चीज़ें
हैं।
धैर्य, विश्वास और सही कर्म का असली अर्थ जानिए
समाज में सबसे
ज़्यादा नुकसान उन लोगों का होता है, जो
बिना दिखावे के सही काम करते हैं। वे कोई पोस्टर नहीं लगाते, कोई भाषण नहीं देते, बस
नियम मानते हैं, दूसरों का ख्याल रखते हैं और अपनी सीमा
में रहते हैं। ऐसे लोग अक्सर पीछे रह जाते हैं, उनका
मज़ाक उड़ाया जाता है,
और कभी-कभी उनके अपने बच्चे भी उनसे
सवाल करने लगते हैं कि आप हमेशा नुकसान में क्यों रहते हैं। यही वह पल होता है
जहाँ अगली पीढ़ी का भविष्य तय होता है, क्योंकि
अगर उस सवाल का जवाब डर या शर्म से दिया गया, तो
बच्चा गलत रास्ता चुन लेगा,
लेकिन अगर उसे यह समझाया गया कि सही
होना आसान नहीं होता,
पर वही लंबे समय में समाज को बचाता है, तो वही बच्चा कल एक बेहतर नागरिक बन सकता है।
यह भी सच है कि civic sense का मतलब सिर्फ नियम मानना नहीं है, बल्कि दूसरों की स्थिति को समझना भी है। बस में खड़े बुज़ुर्ग
को सीट देना, सड़क पर चलते समय जानवरों के लिए थोड़ा
रास्ता छोड़ देना,
किसी कामगार से इंसान की तरह बात करना, भीड़ में धक्का न देना, यह
सब छोटी बातें लगती हैं,
लेकिन यही छोटी बातें मिलकर एक सभ्य
समाज बनाती हैं। जब बच्चा देखता है कि उसके माता-पिता किसी ग़लती पर बहाना नहीं
बनाते, बल्कि जिम्मेदारी लेते हैं, तब
वह सीखता है कि गलती होना बुरा नहीं, गलती
छिपाना बुरा है।
शिक्षा सिर्फ अंक और
करियर तक सीमित नहीं होनी चाहिए। एक सफल इंसान वही नहीं होता जो आगे निकल जाए, बल्कि वह होता है जिसके कारण दूसरों का रास्ता कठिन न हो। जब
तक हम बच्चों को यह नहीं दिखाएँगे कि सामाजिक ज़िम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण
है जितनी व्यक्तिगत सफलता,
तब तक civic sense सिर्फ
शब्दों में ज़िंदा रहेगी,
व्यवहार में नहीं।
शायद अब समय आ गया है
कि हम यह स्वीकार करें कि बदलाव भाषणों से नहीं, उदाहरणों
से आता है। हर माता-पिता,
हर शिक्षक, हर आम नागरिक अपने व्यवहार से किसी न किसी बच्चे को रोज़ कुछ
सिखा रहा है, चाहे वह चाहे या न चाहे। सवाल सिर्फ
इतना है कि हम क्या सिखा रहे हैं। अव्यवस्था को स्वीकार करना या ज़िम्मेदारी
निभाना, सुविधा को प्राथमिकता देना या संवेदनशीलता को, और सबसे ज़रूरी, चुप
रहकर गलत को बढ़ावा देना या शांत तरीके से सही पर टिके रहना।
यही चुनाव इस किताब
की आत्मा है, और यही चुनाव हर दिन, हर सड़क,
हर घर और हर रिश्ते में हमारे सामने
खड़ा होता है।
बच्चे की
आँखों से….
मैं रोज़ स्कूल जाता
हूँ और रास्ते में बहुत कुछ देखता हूँ, पर
समझ नहीं पाता कि जो हमें किताबों में पढ़ाया जाता है, वह बाहर क्यों नहीं दिखता। मेरी किताब में लिखा है कि लाइन में
लगना चाहिए, पर बस स्टॉप पर जो सबसे ज़्यादा धक्का
देता है, वही पहले चढ़ता है। मेरी किताब में लिखा है कि बुज़ुर्गों का
सम्मान करना चाहिए,
पर ट्रेन में मैंने कई बार देखा है कि
दादाजी खड़े हैं और उनके सामने बैठे लोग मोबाइल में इतने डूबे हैं कि उन्हें सामने
का इंसान दिखाई ही नहीं देता। मैं सोचता हूँ कि शायद किताबें पुरानी हो गई हैं, क्योंकि बाहर की दुनिया कुछ और ही सिखा रही है।
घर में मुझसे कहा
जाता है कि सड़क पर कुछ मत उठाना,
गंदगी मत फैलाना, पर जब पापा चलते-चलते काग़ज़ सड़क पर फेंक देते हैं और कहते
हैं कि कोई बात नहीं,
सफाई वाले उठा लेंगे, तब मैं उलझन में पड़ जाता हूँ कि सही कौन है। जब मम्मी कहती
हैं कि किसी से ऊँची आवाज़ में बात मत करना, लेकिन
वही मम्मी किसी काम करने वाले से झुंझलाकर बोल देती हैं, तब मेरे मन में यह सवाल आता है कि क्या नियम सिर्फ मेरे लिए
हैं। कोई मुझे यह नहीं बताता कि मैं किसे फॉलो करूँ, शब्दों
को या व्यवहार को।
स्कूल में हमें
सिखाया जाता है कि सार्वजनिक संपत्ति हमारी अपनी होती है, लेकिन स्कूल बस की सीट पर नाम खोदने वाले बच्चे सबसे ज़्यादा
हँसते हैं और जो उन्हें रोकता है,
उसका मज़ाक उड़ाया जाता है। टीचर डाँटते
हैं, पर अगले दिन वही सब फिर होता है। धीरे-धीरे मुझे लगता है कि
गलती करना कोई बड़ी बात नहीं है,
बस पकड़े जाना बुरा है। शायद यही सबसे
खतरनाक सीख है, जो हमें बिना बताए मिल जाती है।
मैंने शादियों में
देखा है कि बड़े लोग अपनी प्लेट भर लेते हैं और आधा खाना छोड़ देते हैं। जब मैं
कहता हूँ कि इतना क्यों लिया,
तो मुझसे कहा जाता है कि बच्चों को बीच
में नहीं बोलना चाहिए। पर वही लोग जब मुझे कहते हैं कि खाना बर्बाद मत करो, तब मैं समझ नहीं पाता कि सच में बर्बादी क्या होती है। अगर
बड़ा आदमी करे तो ठीक और छोटा करे तो गलत, तो
फिर सही और गलत का मतलब क्या है।
सड़क पर चलते समय मैं
अक्सर देखता हूँ कि जो लोग नियम मानते हैं, उन्हें
ही सबसे ज़्यादा परेशानी होती है। पापा लाल बत्ती पर रुकते हैं और पीछे वाले हॉर्न
बजाते रहते हैं, जैसे पापा ने कोई गलती कर दी हो। एक बार
मैंने पापा से पूछा कि हम भी निकल क्यों नहीं जाते, तो
उन्होंने कहा कि नियम है। उस दिन मुझे उन पर गर्व हुआ, लेकिन अगले दिन जब किसी काम के लिए उन्होंने लाइन तोड़ दी और
कहा कि बहुत देर हो रही है,
तब वही गर्व थोड़ा टूट गया। मैं समझ गया
कि नियम ज़रूरत के हिसाब से बदल जाते हैं।
मैं देखता हूँ कि
अच्छे लोग अक्सर चुप रहते हैं। जब कोई धक्का देता है, जब कोई गलत बोलता है, जब
कोई नियम तोड़ता है,
तब भी ज़्यादातर लोग कुछ नहीं कहते।
शायद उन्हें डर लगता है,
या शायद उन्हें लगता है कि अकेले बोलने
से कुछ नहीं बदलेगा। लेकिन मैं सोचता हूँ कि अगर कोई भी नहीं बोलेगा, तो हम सीखेंगे क्या। मुझे यह भी समझ आने लगा है कि सही होना
आसान नहीं होता, और शायद इसीलिए बहुत कम लोग सही रहना
चाहते हैं।
मुझे सबसे ज़्यादा
अजीब तब लगता है जब बड़े लोग कहते हैं कि आज की पीढ़ी बिगड़ गई है। मैं मन ही मन
सोचता हूँ कि हमने तो सब कुछ आपसे ही सीखा है। हम वही करते हैं जो रोज़ देखते हैं।
अगर हम धक्का देते हैं,
झूठ बोलते हैं, चालाकी करते हैं, तो
शायद इसलिए क्योंकि हमने देखा है कि इससे काम जल्दी हो जाता है। अगर हमें सच में
बदलना है, तो शायद हमें बच्चों को समझाने से पहले खुद को बदलना पड़ेगा।
मैं कोई बड़ा भाषण
नहीं देना चाहता। मैं बस यह चाहता हूँ कि जब आप मुझसे कुछ कहें, तो वही खुद भी करें। अगर आप लाइन में खड़े होते हैं, तो मैं भी खड़ा रहूँगा। अगर आप किसी गलती पर माफी माँगते हैं, तो मैं भी सीखूँगा। अगर आप नियम मानकर नुकसान उठाते हैं, तो मैं समझूँगा कि सही होना कीमत माँगता है, लेकिन वही असली ताकत है।
शायद civic sense कोई विषय नहीं है, जिसे
परीक्षा में पूछा जाए। यह तो रोज़ का व्यवहार है, जो
चुपचाप सिखाया जाता है। और अगर आप मुझसे पूछें कि मैं कैसा नागरिक बनूँगा, तो उसका जवाब किताबों में नहीं, आपके
आज के व्यवहार में छिपा है।
आज की व्यस्त ज़िंदगी में रिश्तों में भावनात्मक दूरी क्यों बढ़ रही है?
सुबह की शुरुआत हमेशा
जैसी ही होती है,
पर हर सुबह समाज का एक नया चेहरा दिखा
देती है, बस देखने वाली आँख चाहिए। उस दिन भी सूरज समय पर निकला था, अख़बार दरवाज़े पर पड़ा था और दूधवाला हॉर्न बजाकर आगे बढ़ गया
था, लेकिन गली के मोड़ पर ही पहला दृश्य बता देता है कि दिन साधारण
नहीं रहने वाला। एक कार गलत साइड में खड़ी थी, जिससे
पूरी गली जाम हो गई थी,
लोग परेशान थे, पर कार मालिक आराम से चाय पी रहा था और कह रहा था कि पाँच मिनट
की ही तो बात है। जो लोग समय पर ऑफिस पहुँचने के लिए परेशान थे, वे चुपचाप रास्ता ढूँढते रहे, क्योंकि
यहाँ गलती पर शर्मिंदा होने वाला कम और सहने वाला ज़्यादा मिलता है।
थोड़ी दूर आगे स्कूल
बस खड़ी थी और बच्चे उतर रहे थे। कुछ बच्चे शांति से लाइन में चल रहे थे, पर कुछ धक्का-मुक्की करते हुए आगे निकलने की कोशिश में थे। एक
माँ अपने बच्चे को डाँट रही थी कि लाइन में रहो, जबकि
वही माँ अगले ही पल गेट पर खड़े गार्ड से तेज़ आवाज़ में बात करने लगी, क्योंकि उसे जल्दी थी। बच्चा यह सब देख रहा था और बिना कुछ कहे
समझ रहा था कि जल्दी और सुविधा के सामने नियम बौने हो जाते हैं। स्कूल के बाहर
सड़क पर अभिभावकों की गाड़ियाँ बेतरतीब खड़ी थीं, हॉर्न
बज रहे थे, और हर कोई अपने बच्चे को सुरक्षित छोड़ने
की चिंता में दूसरों की परेशानी भूल चुका था।
ऑफिस जाने वाली बस
में चढ़ते समय समाज का अगला चेहरा दिखा। एक बुज़ुर्ग खड़े थे, पर सीट पर बैठे युवक मोबाइल में व्यस्त थे। तभी एक लड़की उठी
और बिना कुछ कहे सीट दे दी। किसी ने तारीफ नहीं की, किसी
ने ध्यान भी नहीं दिया,
पर वही पल बता गया कि संवेदनशीलता अब भी
ज़िंदा है, बस शोर नहीं मचाती। अगले ही स्टॉप पर
कुछ लोग ज़ोर-ज़ोर से बातें करते हुए चढ़े, कूड़ा
खिड़की से बाहर फेंका और हँसते हुए बोले कि सफाई वाले हैं ही किसलिए। बस आगे बढ़ती
रही, जैसे समाज भी ऐसे ही आगे बढ़ रहा हो, अच्छाई और लापरवाही दोनों को साथ लेकर।
दफ्तर के समय वही
पुरानी लाइनें, वही पुराने बहाने और वही पुरानी चुप्पी
दिखाई दी। एक व्यक्ति नियम से अपनी बारी का इंतज़ार कर रहा था, फाइल हाथ में थी और चेहरे पर संयम था। उसके सामने एक आदमी
जान-पहचान का हवाला देकर आगे निकल गया और क्लर्क ने भी बिना सवाल किए काम कर दिया।
पीछे खड़े लोग बुदबुदाए,
पर किसी ने आवाज़ नहीं उठाई। उसी कमरे
में एक कर्मचारी ऐसा भी था,
जिसने बिना किसी अतिरिक्त लाभ के एक
वृद्ध महिला का काम समझाकर कर दिया। बाहर निकलते समय महिला की आँखों में संतोष था, जो शायद उस कर्मचारी के लिए किसी इनाम से कम नहीं था।
दोपहर के समय बाज़ार
की भीड़ ने समाज का एक और रूप दिखाया। सब्ज़ी वाले से मोलभाव करते लोग ऐसे पेश आ
रहे थे, जैसे सामने कोई इंसान नहीं, बल्कि
मशीन खड़ी हो। किसी ने ज़्यादा पैसे लौटाने में गलती कर दी, तो एक ग्राहक ने तुरंत पैसे वापस कर दिए, जबकि पास ही खड़े दूसरे व्यक्ति ने वही गलती देखकर चुपचाप पैसे
जेब में रख लिए। दोनों घटनाएँ एक ही दुकान पर, एक
ही समय पर हुईं, और यही समाज की सच्ची तस्वीर थी, जहाँ सही और गलत साथ-साथ खड़े रहते हैं।
शाम होते-होते सड़क
पर ट्रैफिक बढ़ गया। एक तरफ़ लोग लाल बत्ती पर रुककर धैर्य दिखा रहे थे, दूसरी तरफ़ कुछ लोग फुटपाथ से गाड़ी निकालकर आगे बढ़ रहे थे।
हॉर्न, गालियाँ और अधीरता हवा में घुल गई थी। उसी भीड़ में एक व्यक्ति
ने सड़क पार करते एक कुत्ते को बचाने के लिए गाड़ी धीमी की और पीछे वालों की
नाराज़गी झेल ली। किसी ने धन्यवाद नहीं कहा, पर
उस एक पल ने साबित कर दिया कि इंसानियत अब भी पूरी तरह गायब नहीं हुई है।
दिन के अंत में जब घर
लौटकर थकान के साथ सोचने का समय मिला, तो
समझ आया कि समाज कोई एक जैसा नहीं है। यह अलग-अलग चेहरों का समूह है, जो हर दिन,
हर जगह और हर इंसान में बदलता रहता है।
कहीं लापरवाही है,
कहीं संवेदनशीलता, कहीं स्वार्थ है, कहीं
जिम्मेदारी। सवाल यह नहीं है कि समाज कैसा है, सवाल
यह है कि हम हर दिन कौन सा चेहरा चुनते हैं, क्योंकि
वही चेहरा अगली पीढ़ी के लिए आईना बन जाता है। यही एक दिन की कहानी नहीं, बल्कि हर दिन की सच्चाई है, जिसे
हम चाहें तो बदल सकते हैं,
अगर हम अपने हिस्से का चेहरा थोड़ा
बेहतर बना लें।
…और जब यह एहसास गहराता है, तब यह भी समझ में आता है कि समाज किसी सरकार, किसी नियम या किसी किताब से नहीं बनता, बल्कि उन छोटे-छोटे चुनावों से बनता है जो हम हर दिन करते हैं।
सुबह घर से निकलते समय,
सड़क पर चलते हुए, दफ्तर में काम करते हुए, बाज़ार
में खरीदारी करते हुए और रात को थककर घर लौटते समय हम लगातार तय कर रहे होते हैं
कि हम किस तरफ़ खड़े हैं। हम उस तरफ़ जहाँ सुविधा के लिए नियम तोड़े जाते हैं, या उस तरफ़ जहाँ थोड़ी असुविधा सहकर भी दूसरों का हक़ बचाया
जाता है। सबसे बड़ी विडंबना यही है कि हम अक्सर समाज को दोष देते हैं, लेकिन यह भूल जाते हैं कि समाज हमसे ही बनता है और हमारे बच्चे
उसी समाज को देखकर अपने भीतर भविष्य गढ़ते हैं।
अगर एक दिन में इतने
अलग-अलग चेहरे दिखाई दे सकते हैं,
तो इसका मतलब यह भी है कि उम्मीद अभी
ज़िंदा है। हर उस व्यक्ति के साथ जो धक्का देता है, कोई
न कोई ऐसा भी है जो रुककर रास्ता देता है। हर उस इंसान के साथ जो फायदा उठाकर चुप
रह जाता है, कोई ऐसा भी है जो ईमानदारी से नुकसान
स्वीकार कर लेता है। फर्क बस इतना है कि अच्छाई ज़्यादातर शांत होती है, वह शोर नहीं मचाती, वह
दिखावा नहीं करती,
और शायद इसीलिए हमें कम नज़र आती है।
लेकिन वही खामोश अच्छाई बच्चों के मन में सबसे गहरी छाप छोड़ती है, क्योंकि बच्चे शब्दों से नहीं, दृश्यों
से सीखते हैं।
समाज को बदलने के लिए
किसी बड़े आंदोलन की ज़रूरत नहीं होती। ज़रूरत होती है रोज़ के छोटे-छोटे
व्यवहारों को थोड़ा बेहतर बनाने की, अपने
बच्चों के सामने वही करने की जो हम उनसे उम्मीद करते हैं, और यह स्वीकार करने की कि civic sense कोई
अलग विषय नहीं, बल्कि जीने का तरीका है। जिस दिन हम यह
मान लेंगे कि हर सार्वजनिक जगह हमारी अपनी जगह है, हर
अनजान व्यक्ति भी सम्मान का हक़दार है और हर नियम किसी को परेशान करने के लिए नहीं, बल्कि सबको सुरक्षित रखने के लिए है, उसी दिन समाज का चेहरा अपने आप बदलने लगेगा।
दिन खत्म हो जाता है, रात गहरी हो जाती है, लेकिन
सवाल वहीं रह जाता है कि अगली सुबह हम कौन सा चेहरा लेकर बाहर निकलेंगे। वही
पुराना, जो कहता है कि इससे क्या फर्क पड़ता है, या वह नया,
जो चुपचाप सही काम करता है, भले ही उसकी कोई तारीफ न हो। क्योंकि अंत में फर्क इसी से
पड़ता है, और यही फर्क आने वाले कल की सबसे मजबूत नींव बनता है।
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