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भूख पेट की होती है या मन की? भोजन, लालच और हमारी आदतों की सच्चाई

शादियों और पार्टियों में खाने का व्यवहार

Q1. पेट की भूख और मन की भूख में क्या अंतर है?
Q2. शादियों में लोग ज़रूरत से ज़्यादा खाना क्यों लेते हैं?
Q3. नाम सुनते ही खाने का मन क्यों करता है?
Q4. भोजन की बर्बादी कैसे रोकी जा सकती है?

भोजन का नाम सुनते ही हमारे दिमाग में तरह-तरह के पकवानों की तस्वीरें घूमने लगती हैं। अब मान लीजिए कि सुबह आपने पराठे, दही और चाय का भरपूर नाश्ता कर लिया हो, लेकिन तभी कोई दोस्त कह दे – “चल यार, नयी खुली चाट की दुकान पर चलते हैं”। ज़रा सोचिए, आप सचमुच भूखे हैं या सिर्फ़ नाम सुनकर ही आपके मुंह में पानी आ गया? यही हमारी असली समस्या है। पेट कहता है – “बस भाई, और नहीं चाहिए” लेकिन मन कहता है – “अरे ज़रा चख ही लो, इससे क्या फर्क पड़ेगा।”

अब बात करते हैं शादियों और पार्टियों की। वहाँ का नज़ारा तो बिल्कुल अलग ही होता है। दूल्हा-दुल्हन मंडप में बैठे हों या न हों, लेकिन आधे मेहमान तो बुफे काउंटर पर खड़े रहते हैं। कोई प्लेट में पाँच तरह की मिठाइयाँ डाल चुका है, कोई पिज़्ज़ा और छोले-भटूरे साथ-साथ ले रहा है, जैसे यह कोई नया ‘फ्यूज़न डिश’ हो। और कुछ लोग तो ऐसे होते हैं जिनकी प्लेट देखकर लगता है कि वे होटल से पैकेट बंधवाकर लाए हैं।

बुफे की सबसे मज़ेदार बात यह होती है कि लोग पेट से ज़्यादा दिमाग लगाते हैं। सोचते हैं – “प्लेट के पैसे तो लग चुके हैं, अब पूरा वसूल करना है।” अब यह कौन समझाए कि पैसे से ज़्यादा कीमती आपका स्वास्थ्य है। पर उस समय किसी को याद ही नहीं रहता। मन ही मन हर कोई सोचता है – “यह भी ट्राई करना चाहिए, वो भी खाना चाहिए, वरना बाद में अफसोस होगा।” और नतीजा यह होता है कि खाने का आनंद लेने की बजाय लोग खाने से जूझते हैं।

आपके साथ भी ज़रूर ऐसा हुआ होगा कि भरपेट खाने के बाद अचानक पेट में भारीपन, आलस और नींद आ जाती है। फिर उसी समय कसम खाई जाती है – “बस, अगली बार संयम रखूँगा।” लेकिन जैसे ही अगली शादी का कार्ड आता है, सारी कसमें रसगुल्ले के सिरप में घुल जाती हैं।

डॉक्टरों का नाम भी मज़ेदार बहाना है। कोई कह देगा – “यह सूप हेल्दी है, यह सलाद डाइट के लिए अच्छा है” और हम बिना भूख के भी खाने लगते हैं। असलियत यह है कि अगर ज़रूरत से ज़्यादा खाना है तो चाहे वह सलाद ही क्यों न हो, पेट को तंग करेगा ही।

असल में, हम सबको अपने मन से एक सवाल पूछना चाहिए – “क्या मैं भूख से खा रहा हूँ या बस सामने देखकर?” अगर ईमानदारी से जवाब मिल गया तो आधी समस्या वहीं खत्म हो जाएगी।

जीवन में असली मज़ा तभी है जब भोजन से ऊर्जा मिले, सुकून मिले। साधारण दाल-चावल भी पेट भरकर खुशी देते हैं अगर भूख सच्ची हो। लेकिन जबरदस्ती का ‘ओवरईटिंग’ तो सबसे स्वादिष्ट पकवान को भी बोझ बना देता है।

इसलिए अगली बार जब आप किसी पार्टी या शादी में जाएँ, तो याद रखिए – प्लेट को ‘एग्ज़ाम शीट’ मत बनाइए जहाँ सबकुछ लिखना ज़रूरी हो। बस उतना ही चुनिए जितना पेट कहे। पैसा वसूल करने का असली तरीका यही है कि आप खाने का मज़ा लें, न कि उसके बाद दवा खोजते फिरें।

आख़िरकार, खाना जीवन का आनंद है, लेकिन संयम ही उस आनंद को टिकाऊ बनाता है।

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